Saturday, 9 November 2013

aaina....

आईना  देखा तो यकीन आया ही नहीं
ये वही आँखें हैं जिन में कभी जिंदगी जीने का जूनून था?
वहाँ तो बस सपनो कि धुंधलाती हुयी तसवीरें नज़र आयी
वहाँ तो बस आंसुओं से भीगी पलकों कि एक झलक नज़र आयी।

अपनी हसरतों को किस कदर दफना दिया खुश हो कर हमने
अपने दामन को खाली ही समेत लिया किस तरह हमने
अपने जज़बातों के सारे रंग मिटते हुए दिल टूटा भी नहीं हमारा
ये क्या कर लिया खुदको कि अब अपने आप से ही अनजान हो गए हैं?

सिसकने से बिलखने से अपने आप को वापस नहीं बुला पा रहे हैं
कहाँ छोड़ आये हैं खुद को अब वो रास्ता ढूंढ नहीं पा रहे हैं
खालीपन इन आँखों का अब मेरे अंदर घर कर रहा है
तभी तो ये आइना अपना चेहरा बदल रहा है.